शिक्षा के मंदिर बन गए शमशान घाट

abhinav Shiksha
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शिक्षा के मंदिर बन गए शमशान घाट : प्रदेश के सरकारी स्कूलों व कॉलेजों का हाल बेहाल

यह शीर्षक जितना पीड़ादायक लगता है, वस्तुस्थिति उससे भी अधिक खराब है. आप यहाँ तक कह सकते हैं कि राजस्थान और भारत के कर्णधारों ने शिक्षा की अंत्येष्टि ही नहीं कर दी है बल्कि उसे जिन्दा जला दिया है. सरकारी शिक्षण संस्थाओं के हाल देखकर ऐसा लगता है कि काश! इस बारे में अज्ञानता ही बनी रहती. भ्रम तो नहीं टूटता. अखबारों में नई स्कूलें खुलने, नए स्कूल भवन बनने, सर्वशिक्षा अभियान, साक्षरता अभियान आदि की ख़बरें जब तब आती रहती हैं. यह भी पढ़ने को मिलता रहता है कि नए नए कॉलेज, विश्वविद्यालय खुल रहे हैं. इससे एक आम आदमी को भ्रम बना रहता है कि सरकार कितना कुछ शिक्षा के लिए कर रही है. कितने चिंतित हैं, मंत्री, सचिव, मुख्यमंत्री. शिक्षा के लिए. भ्रम इसलिए भी बना रहता है, क्योंकि अधिकांश लोग जो अखबार पढते हैं, उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढते हैं. बच्चे तो इन मंत्रियों, सचिवों और मुख्यमंत्रियों के भी इन स्कूलों में, इन कॉलेजों में नहीं पढते हैं. आप इसे जांच लेना. उनके बच्चे निजी संस्थाओं में पढते हैं. उन्होंने तो सरकारी स्कूलों से कब का किनारा कर लिया है. फिर भी अखबारों के पाठक और नेताओं की सभाओं के श्रोता इस भ्रम में जीते हैं कि चलो ‘गरीबों’ के लिए, पिछडों के लिए सरकार कुछ तो कर ही रही होगी, वर्ना अखबारों में इस बारे में इतना क्यों छपता रहता है.

लेकिन ‘अभिनव राजस्थान अभियान’ में ऐसे भ्रम तो टूटने ही हैं. अपने भ्रम तो टूटेंगे ही, अपने सहयोगियों और पाठकों के भ्रम भी नहीं बचने वाले. व्यवस्था की एक एक परत सरल शब्दों में खुलती रहेगी. हालांकि यह परतें उघाड़ना कोई मजेदार काम नहीं है, इसमें कोई संतुष्टि हमें नहीं मिलती है. हम केवल आलोचना के धंधे पर नहीं हैं. हमारे अभियान में आलोचना पर कम जोर है. हमारा अधिक जोर समस्या की तह तक जाकर समाधान ढूँढना है. फिर भी शिक्षा की अंत्येष्टि की खबर लिखना इतना आसान नहीं है. दर्द भरा काम है. भयावह तस्वीर का चित्रण मुश्किल है. शायद यह दुनिया का सबसे गया गुजरा सरकारी शिक्षा तंत्र है. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था ने दुनिया में केवल किरगिजस्तान को इस दृष्टि से भारत से नीचे बताया है. लेकिन हमें तो संदेह है कि वहां भी इतना बुरा हाल नहीं होगा.

एक एक कर इन बिंदुओं पर गौर करिये. कैसी तस्वीर उभरती है, आपके मन में. आपको यह भी बता दें कि ये समीक्षा कोई ‘यूँ ही’ नहीं लिखी जा रही है. वास्तविक अनुभव और सघन निरीक्षण के बाद लिखी जा रही है. किसी शिक्षक या शाला में अपवाद दिखे, तो ईश्वर की विशेष कृपा समझिए. ईश्वर करे कि ये अपवाद सब तरफ फ़ैल जाएँ, जैसा ‘अभिनव राजस्थान’ में होना है. यह भी ध्यान दें कि हमने तो इसे राजस्थान के सन्दर्भ में लिखना है, पर आप इसे समस्त भारत के और विशेषकर पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वी भारत के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं. दक्षिण में स्थिति फिर भी बेहतर है.

प्रारंभिक शिक्षा (प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय)

अधिकांश विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात गडबडाया हुआ है. बच्चों की संख्या अत्यंत कम है और अध्यापक ज्यादा हैं. ऐसे स्कूल भी हैं जहां एक-दो विद्यार्थी हैं और दो-तीन अध्यापक हैं. लेकिन नामांकन का रजिस्टर भरा मिलेगा. नामांकन का सरकारी लक्ष्य आपको पूरा मिलेगा. निरीक्षण करने वाला अधिकारी भी खुश कि चलो ‘कागज’ तो सही हैं. विश्व में शिक्षा की ऐसी दुर्दशा कहीं नहीं मिलेगी. देश के साथ ऐसा खिलवाड़ अब अफ्रीका और एशिया के हमारे साथी देश भी नहीं कर रहे हैं. इस तरह के फर्जीवाड़े पर वे शर्मिंदा होते हैं. और यहाँ इस फर्जीवाड़े का सरकार महिमामंडन करती है. दरअसल सरकार ही शिक्षक को फर्जीवाड़े के लिए प्रोत्साहित करती है. शिक्षक का कोई दोष नहीं है. आम जनता तो यही सोचती है कि शिक्षक वर्ग की नीयत खराब हो गयी है. वे अपनी नौकरी बचाने के लिए ये सब करते हैं. जबकि ऐसा नहीं है. यह सरकार है जो कहती है कि कुछ भी करो, आंकड़े दिखाओ. लेकिन सवाल यह है कि यह सरकार किसके लिए यह सब कर रही है, किसको यह आंकड़े दिखाने के लिए यह ‘पाप’ कर रही है ? ये आंकड़े बताने हैं, विश्व के अन्य देशों को. अपनी झूठी शान बघारने के लिए, कि देखिये हमारे यहाँ भी शिक्षा का प्रतिशत कितना ऊंचा है ! अब उनका तो प्रतिशत वास्तव में ही ऊंचा है, लेकिन हम उनकी बराबरी कैसे करें ? धरातल पर मेहनत कौन करे ? इतना समर्पण और देश प्रेम कहाँ बचा है, आजाद भारत के पदलोलुप अफसरों और नेताओं में. तो हमारे कलाकार अफसरों और नेताओं की जादूगरी का कमाल देखिये. राष्ट्रीय स्तर पर खेला गया यह खेल देखिये. आंकड़े जुटाने का खेल देखिये.

इन विद्यालयों में इन अध्यापकों के अपने बच्चे नहीं पढते हैं. इन्हें अपनी और अपनी स्कूल की क्षमता पर पूरा संदेह है. आपकी मिठाई की दूकान हो और आप उस मिठाई को न खाओ, ऐसा लोगों को पता चल जाए तो क्या वह दुकान चलेगी ? लेकिन यह दुकान चल रही है. माल नहीं बिक रहा है, लेकिन यहाँ के हलवाई को पूरी तनख्वाह मिल रही है. ऐसी बर्बाद दुकान आप और कहाँ देख पायेंगे.

शिक्षकों के ही नहीं, गांव या शहर के सभी संपन्न और मध्यम दर्जे के परिवारों के बच्चे भी इन स्कूलों में नहीं पढते हैं. वे अधिक फीस देकर भी निजी संस्थाओं में अपने बच्चों को भेजते हैं. अब तो अधिकतर गरीब परिवार भी निजी संस्थाओं का रूख कर चुके हैं. वे कहते हैं कि हम सरकार के झूठे दावों के पीछे अपने बच्चों के जीवन से खिलवाड़ नहीं कर सकते हैं. मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताबें, मुफ्त खाना भी इनके लिए आकर्षण नहीं बन पाते हैं. अब जो बच्चे आपको इन स्कूलों में पूरे राजस्थान में दिखेंगे, वे कौन होंगे ? वे होंगे, अत्यंत पिछड़े वर्गों के. इनमें भी उन मां-बाप के बच्चे जिनके लिए बच्चे का पढ़ना कुछ खास मायने नहीं रखता. जीवन की दूसरी परेशानियों में वे इतने उलझे रहते हैं कि इस विषय पर सोचने का भी उन्हें समय नहीं है. उनके लिए स्कूल बच्चे के खेलने की जगह है, या फिर पोषाहार जीमने की जगह है.

कक्षा आठ तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं करना है. ’कुछ’ भी करके उसे पास करना है. बोर्ड पर लिख देना है, जो उसे परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में लिखना है. या कोई किताब या पासबुक उसे थमा देनी है, जिसमें से देखकर वह उत्तर लिख सके. बस जैसे तैसे उसकी कापी भरी हुई मिलनी चाहिए. शिक्षक से इस बारे में कोई सवाल नहीं करेगा. वह चाहे तो पास का प्रमाण पत्र बच्चे के घर पर दे आये. दे आये. फिर ड्रॉप आउट कहाँ से होगा. हो गया टारगेट पूरा. सभी बच्चे राजस्थान भर में आठवीं तक तो कम से कम पढ़े लिखे कहलायेंगे. अब कैसे पढ़े लिखे हैं, यह परेशानी इन खिलाड़ियों की नहीं है. नींव कमजोर रह गयी है तो भुगतो ये बच्चे और इनके मां-बाप. अफसरों, नेताओं और शिक्षकों को क्या. उनके बच्चे तो इनमें शामिल हैं नहीं. आप इससे ज्यादा किसी अमानवीय हालत या शासन के बारे में सोच सकते हैं ?

स्कूल के निरीक्षण का अब सीधा अर्थ है- पोषाहार का निरीक्षण. या नए बन रहे भवन का निरीक्षण. अब स्कूल इन्स्पेक्टर यह नहीं देखता है कि अमुक स्कूल में पढाई कैसी चल रही है. पढाई अब स्कूल का विषय नहीं है, पोषाहार है. जब पढाई से ही मतलब नहीं है, तो हो गयी न अंत्येष्टि शिक्षा की. अब यह एक सामुदायिक पोषाहार केंद्र है. इसे स्कूल मत कहिये ! इन्स्पेटर बुरा मान जाएगा, जयपुर या दिल्ली के अफसर और नेता भी बुरा मान जायेंगे !

माध्यमिक, उच्च माध्यमिक और उच्च शिक्षा

यहाँ तक जो विद्यार्थी सरकारी तंत्र से पहुंचा है, उसका अंदाज तो आपको ऊपर हो गया होगा. जैसी नींव वैसा मकान होगा ही. लेकिन यहाँ तो दीवारों में भी धांधली है. प्रारंभिक शिक्षा के बाद यहाँ भी हाल खराब हैं. दसवीं की बोर्ड परीक्षा में अधिकतर सरकारी विद्यार्थियों की क्या उपलब्धि रहेगी, यह आप अंदाज लगा सकते हैं.

इस स्तर पर भी छात्र शिक्षक अनुपात गडबड है. वहीं विज्ञान, गणित और अंग्रेजी विषयों के अध्यापक आपको लगभग पूरे राजस्थान में कम मिलेंगे. इन तीनों महत्त्वपूर्ण विषयों की अनदेखी से बच्चों के आगे के जीवन में बड़ी कमी रह जाती है.

उच्च माध्यमिक स्कूलों में से अधिकांश में केवल कला संकाय है. वाणिज्य और विज्ञान के संकाय विशेषज्ञ शिक्षकों के अभाव में खोले ही नहीं गए हैं, या फिर बंद कर दिए गए हैं. आज के युग के महत्त्वपूर्ण विषय, वाणिज्य और विज्ञान पढ़ने हैं तो सरकार आपके लिए कुछ नहीं कर सकती. लोक कल्याणकारी सरकार कुछ नहीं कर सकती.

कॉलेज और यूनिवर्सिटी लगभग बंद हैं. वहां केवल व्याख्याता, प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल, किसी बंद पड़ी फेक्ट्री के प्रबंधकों या चौकीदारों की तरह आते हैं, घूम कर चले जाते हैं. ठीक वैसे ही, जैसे कई प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थी आते हैं और पोषाहार करके चले जाते हैं ! ये भी उन विद्यार्थियों की ही तरह, मात्र घूमने आते हैं और मोटी तनख्वाह लेकर चले जाते हैं. क्लास लेना इनकी शान के खिलाफ सा हो गया है. ये कहते हैं कि विद्यार्थी ही रुचि नहीं लेते हैं, हम क्या करें . ये भूल जाते हैं कि रुचि पैदा करना ही तो शिक्षकों का काम होता है. फिर ये अपने खुद के बच्चों के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोचते हैं ? उनकी पढाई को लेकर कैसे चिंतित रहते हैं ? उनमें पढ़ने की रुचि कहाँ से आती होगी ? उधर औपचारिक रूप से कॉलेज के विद्यार्थी की उपस्थिति कागजों में 75%. अनिवार्य है, जिसे ये अपने प्रारंभिक शिक्षा के भाईयों की तरह पूरा कर देते हैं ! हकीकत में तो राजस्थान के लगभग सभी सरकारी कॉलेजों में अधिकतम दस प्रतिशत विद्यार्थी ही रोज आते हैं. वे भी वाणिज्य और विज्ञान के विद्यार्थी. और आप इसके लिए कभी भी अफसरों, नेताओं या मुख्यमंत्री को परेशान नहीं देखेंगे. वे तो अभी स्कूलों के नामांकन बढ़ाने और पोषाहार के लिए अधिक ‘चिंतित’ हैं ! आहन, वे कॉलेज के छात्र संघ के उद्घाटन या सांस्कृतिक कार्यक्रम में जरूर जाकर आ जाते हैं, साफा बंधवा लेते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि क्लासें लगती है या नहीं. इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं. यानि हो गया, शिक्षा की अंत्येष्टि के बाद उसका अंतिम क्रियाकर्म भी संपन्न !

दोषी कौन ?
शिक्षा की इस हत्या का दोषी कौन ?
अ. नेता ब. अफसर स.शिक्षक या द. अभिभावक.

‘अभिनव राजस्थान अभियान’ में दोषी का पता भी लगा लिया गया है. इन चारों में से कोई नहीं है वो. बल्कि कोई पांचवा है. और वो है, समाज का जागरूक नागरिक, चिन्तक जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है, जिसकी जिम्मेदारी किसी भी समाज को , देश को सही दिशा में ले जाने की होती है. वह अपनी जिम्मेदारी इस स्वतंत्र देश में भूल सा गया है और बहाने बनाकर बच रहा है, दूर भाग रहा है. उसी की सुस्ती के कारण नेता और अफसरों ने शिक्षा का ही नहीं सारी व्यवस्था का तमाशा बना कर रख दिया है. उसी के छुप जाने से शिक्षक का सम्मान कम हो गया है और शिक्षक राष्ट्र निर्माण के कर्त्तव्य से फिसल रहा है. उसी दोषी को, बुद्धिजीवी को हम अपने अभियान में प्रायश्चित के लिए कहेंगे और ‘अभिनव शिक्षा’ के हमारे मॉडल को उसके माध्यम से पूरे प्रदेश में लागू करवायेंगे. शिक्षा का वह मॉडल हमारे पिछले अंकों में वर्णित है और हमारी वेबसाइट abhinavrajasthan.org पर भी उपलब्ध है.

नोट करें- शिक्षा का अधिकार अधिनियम की समीक्षा फिर करेंगे. वैसे आप यह मान लें कि उस अधिकार का भी जनजागरण के अभाव में वही हाल है, जो रोजगार के अधिकार(नरेगा) या सूचना के अधिकार का है या कहें कि वोट के अधिकार या मानवाधिकार का है. केवल अधिकार दे देने से क्या होता, उसे लागू करने का जज्बा और समर्पण भी तो चाहिए. आगे और भी बुरी गत होनी है, जब खाद्य सुरक्षा का अधिकार आएगा.
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