यूनिवर्सिटी ने पहले कहा सूचनाएं नहीं दे सकते, अपील में गए तो दी अधूरी सूचना

यूनिवर्सिटी ने पहले कहा सूचनाएं नहीं दे सकते, अपील में गए तो दी अधूरी सूचना

सूचना के अधिकार कानून को लेकर सरकारी अधिकारी गंभीर नहीं है। हाल ही में मत्स्य यूनिवर्सिटी से आरटीआई में सूचना मांगे जाने पर पहले तो यूनिवर्सिटी ने मना कर दिया, लेकिन अपील में जाते ही यूटर्न लिया और परिवादी को अधूरी सूचनाएं थमा दी।

परिवादी विष्णु चावड़ा ने मत्स्य यूनिवर्सिटी से सूचना के अधिकार के तहत यह सूचना मांगी कि यूनिवर्सिटी में सत्र 2015-16 में स्नातक स्नातकोत्तर कक्षाओं में विषयवार कितने परीक्षक नियुक्त किए गए और एक परीक्षक को कितनी उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के लिए दी गई और कितनी कालावधि में जांचने कितना मानदेय दिया जाता का विवरण सत्यापित प्रतिलिपि उपलब्ध कराएं।

इस सूचना के मांगे जाने के बाद मानों यूनिवर्सिटी में हलचल का माहौल पैदा हो गया। विष्णु का कहना है कि पहले तो समझौते के कई प्रयास किए गए, लेकिन मेरे द्वारा मना कर देने के बाद मुझे यह जवाब दिया गया कि कानून के 8.1.जी के तहत यह सूचना नहीं दी जा सकती। इसके बाद मेरे द्वारा इसकी अपील वाइस चांसलर को की गई। वहां से मुझे अधूरी सूचनाएं थमा दी गई और शेष सूचनाओं के लिए फिर से उसी नियम का हवाला देते हुए सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराई गई।

विष्णु का कहना है कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराई जा सकें। मेरे द्वारा मांगी गई सूचनाएं किसी की जान-माल को प्रभावित नहीं कर रही है, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रबंधन स्वयं की कमियों को उजागर होने से बचाने के लिए सूचनाएं नहीं दे रहा है एवं अधूरी सूचनाएं देकर टरका रहा है। इसके खिलाफ जल्दी ही आयोग में अपील करूंगा

^प्रार्थीको जो सूचनाएं कानून के तहत दी जा सकती थी वो दी गई हैं। फिलहाल हम सभी कानून राजस्थान यूनिवर्सिटी के फॉलो कर रहे हैं। ऐसे में कई संशोधन के ऑर्डिनेंस भी हैं, जिनके तहत सूचनाएं नहीं दी जा सकती। किसी भी वाजिब सूचना के लिए मना नहीं किया गया है।-रमेशचंद भारद्वाज, रजिस्ट्रार मत्स्य यूनिवर्सिटी

^यूनिवर्सिटीपदाधिकारी झूठ बोल रहे हैं। जब कॉपी जांचने के बदले कार्मिक द्वारा भुगतान लिया गया है तो वह उसकी व्यक्तिगत सूचना तो हुई ही नहीं। चूंकि परीक्षा परिणाम जारी हो चुका है इसलिए सूचना अब गोपनीय भी नहीं है। यूनिवर्सिटी को सूचना देनी ही होगी। मैने भी कई मामलों में आयोग की शरण ली थी तब सूचनाएं निशुल्क उपलब्ध कराई गई। -हरीसिंह सैनी, आरटीआई कार्यकर्ता

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