बाड़मेर : 1000 ही मिलते हैं, क्या बदलवाएं और क्या खाएं?

500 और 1000 के नोट illigel

बाड़मेर : 1000 ही मिलते हैं, क्या बदलवाएं और क्या खाएं?

बाड़मेर : 1000 और 500 के नोट बंद होते ही जहां एक ओर बैंकों में कतार लग गई है और लोग अपने हजार पांच सौ के नोट को बदलवाने की चिंता में लगे हुए है। वहीं जरूरतमंद महिलाओं का एक तबका एेसा भी है जो अपने एक हजार रुपए के लिए महीनों से इंतजार कर रही है। इनकी सरकार से एक ही मिन्नत है कि पंद्रह साल हो गए हंै उनको काम करते हुए। अब तो सरकार उनको इतना मेहनताना दें कि गुजारा करना संभव हों। ये महिलाएं स्कूल से पचास से अधिक बच्चों के लिए रोज खाना पकाती है, इसलिए मेहनत भी कम नहीं है।

मिड-डे-मील योजना के तहत राज्यभर में प्रत्येक विद्यालय में वर्ष 2000 में न्यायालय के आदेश के बाद दोपहर का भोजन शुरू किया गया और इसके लिए जरूरतमंद, बीपीएल और पिछड़े तबके की महिलाओं को मानदेय पर रखा गया। पहले इनको कुकिंग कन्वर्जन (खाना पकाने ) की राशि मंे से बचत होने वाले रुपए दिए जा रहे थे।

फिर पांच साल बाद तय किया गया कि अब इनको एक हजार रुपए निश्चित मानदेय दिया जाएगा। एक महिला को पचास से अधिक बच्चों का खाना प्रतिदिन बनाना होता है। बर्तन साफ करने से लेकर सारा कार्य यही महिलाएं करती है। एेसे में इनको कम से कम तीन से पांच घंटे विद्यालय को देने होते हंै। इतनी मेहनत के बावजूद मेहनताना महज हजार रुपए मिल रहा है जिससे गुजारा करना भी मुश्किल है।


80 प्रतिशत एकल महिलाएं

चयन का पहला आधार एकल महिला को रखा गया था। एेसे में इस कार्य में लगी 80 फीसदी महिलाएं एकल है। इन महिलाओं व आश्रितों का गुजारा इसी एक हजार रुपए पर हो रहा है, जो महंगाई के इस दौर में मुश्किल ही नहीं नामुमकिन जैस है। इन महिलाओं का मानदेय बढऩा चाहिए।

– शेरसिंह भुरटिया, प्रदेश प्रतिनिधि प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षक संघ

यह बहुत ही गंभीर मामला है। गरीब परिवारों की महिलाओं को महज 1000 रुपए में महीना भर काम करवाना ठीक नहीं है। राज्य सरकार कम से कम इन महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी दें और इनको नियमित भी किया जाए। ऐसी महिलाओं की हालत बहुत ही खराब है।

– लक्ष्मण बडेरा, अध्यक्ष मजदूर यूनियन

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