निजी स्‍कूल में ड्रेस : मनमानी का खेल

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निजी स्‍कूल में ड्रेस : मनमानी का खेल

जोधपुर : देश में नोटबंदी के बाद भले ही नौकरशाही और नेताओं के कालेधन कमाने के जरिए पर अंकुश लग जाए, लेकिन यूनिफॉर्म विक्रेताओं से मिले हुए स्कूल संचालकों की काली कमाई पर फिलहाल अंकुश लगते हुए दिखाई नहीं दे रहा है।

यूनिफॉंर्म विक्रेता स्कूल संचालकों के साथ मिलकर हर बार ड्रेस बदलवा रहे हैं, जिसका असर अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है और बच्चों की पढ़ाई के नाम पर जबरन वसूली जा रही यह मोटी कमाई यूनिफॉर्म विक्रेताओं और स्कूल संचालकों की जेब में पहुंच रही है।

राजस्थान पत्रिका सनसिटी एक्सपोज के शनिवार के अंक में ‘जेब भले ही कटे, खरीदना आपको यहीं से पड़ेगा’ शीर्षक से प्रकाशित खबर के बाद शहर के कई अभिभावकों ने फोन कर अपनी पीड़ा बताई और कहा कि स्कूलों के निर्देशों हर कोई यूनिफार्म विक्रेताओं से परेशानको नहीं मानने पर सजा उनके बच्चों को भुगतनी पड़ती है। बच्चों के भविष्य को देखते हुए वे कुछ बोल भी नहीं सकते। सैकड़ों अभिभावकों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर अपनी परेशानियां बताई। पेश हैं एक रिपोर्ट :

हर कोई यूनिफार्म विक्रेताओं से परेशान

नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर एक अभिभावक ने बताया कि उनका बच्चा यूरो इंटरनेशनल में पढ़ाई करता है। जिसकी स्कूल ड्रेस बच्छराज यूनिफॉर्म पर ही मिलती है। यहां एक बार यूनिफॉर्म खरीदने में तीन हजार से अधिक का खर्च हो गया। इन्होंने बताया कि जॉब के चलते इन्हें बार-बार शहर बदलने होते हैं, लेकिन इतना यूनिफॉर्म खर्च दिल्ली, मुंबई और बेंगलूरु जैसे बड़े शहरों में भी नहीं आया।

इस साल बदल दी ड्रेस

अभिभावक रवींद्र कुमार सहित अन्य अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चे एमपीएस में पढ़ाई करते हैं। स्कूल की ड्रेस निर्धारित दो जगह पर ही मिलती है। इनमें एक बच्छराज यूनिफॉर्म है और दूसरी चन्द्रहास है। मोनोपॉली के चलते इन दोनों दुकानों पर यूनिफॉर्म की कीमतें ज्यादा हैं। स्कूल वालों ने इस बार कई क्लास में हाफ शर्ट की बजाय फुल शर्ट कर दी है। बच्चे को ब्लेजर के साथ स्वेटर भी लेना जरूरी है। साथ ही ड्रेस में टाई भी इस साल से शुरू की है।

नया ब्लेजर नहीं पहना तो पीछे खड़े होंगे

सेंट पॉल स्कूल में पढऩे वाले बच्चों के कई अभिभावकों ने बताया कि इस बार स्कूल ने ब्लेजर बदल दिया है। बच्चों से कहा है कि जो नया ब्लेजर नहीं पहनेंगे, वो पीछे खड़े होंगे, इससे बच्चों में हीन भावना आती है। यह ड्रेस सिर्फ बच्छराज यूनिफॉर्म पर मिल रही है। एक अभिभावक ने कहा कि पिछले साल उन्होंने 512 रुपए की एक शर्ट खरीदी। इस बार यह फिर बदल गई है। अब बार-बार बच्चों को कहां से ड्रेस दिलाएं

दो दिन लाइन में लगे, फिर भी नहीं मिली

अभिभावक अनिल ने बताया कि उनके पोते शहर के मयूर चौपासनी स्कूल में पढ़ते हैं। स्कूल की ड्रेस बच्छराज यूनिफॉर्म पर मिलती है। वे ड्रेस के लिए दो दिन लाइन में लगकर आए, लेकिन नहीं मिली।

ड्रेस नहीं पहनी तो घर भेज देते हैं

अभिभावक रूबीना बानो ने बताया कि उनकी बेटी आशा पब्लिक स्कूल में पढ़ती है। इस स्कूल की ड्रेस सिर्फ मित्तल यूनिफॉर्म पर मिलती है। बच्चा एक दिन ड्रेस पहनकर नहीं जाए, तो स्कूल से वापस भेज देते हैं, जिससे बच्चे की पढ़ाई भी खराब होती है।

ड्रेस में आना, नहीं तो बाहर खड़ा कर देंगे

एक अभिभावक ने बताया कि उनका बच्चा स्टेप बाई स्टेप स्कूल में पढ़ता है। स्कूल वालों ने अभी स्वेटर चेंज किया है और कहा कि सोमवार से ड्रेस में आना, नहीं तो स्कूल के बाहर खड़ा कर देंगे। स्कूल वालों ने बच्चे के साथ बच्छराज यूनिफॉर्म का नाम लिखकर पर्ची भेजी है। वे ड्रेस लेने भी गए, लेकिन यूनिफॉर्म विके्रता ने कैश नहीं लिया। अब वे स्कूल और यूनिफार्म विक्रेता की मिलीभगत से दोनों तरफ से परेशान हो रहे हैं।

वारंटी दिखाकर दोगुनी कीमतें

शहर के बच्छराज यूनिफॉर्म पर इन दिनों दो साल की वारंटी दिखाकर अन्य दुकानों से दोगुनी कीमतें वसूली जा रही हैं। दुकान संचालक अपने कपड़े की अच्छी क्वालिटी बताकर दो साल की वारंटी का झूठा वादा करते हैं, लेकिन यह वारंटी सिर्फ चेन और बटन की होती है, जिसके खराब होने पर यूनिफॉर्म विक्रेता अभिभावक को कई बार घुमाते हैं। इसमें अभिभावकों का 50 से 100 रुपए का पेट्रोल और समय बर्वाद हो जाता है, जबकि कपड़ों में चेन और बटन का खर्च 20-30 रुपए से अधिक नहीं होता।


फैक्ट फाइल

निजी स्कूल : 2 हजार
विद्यार्थी : 1 लाख 50 हजार
अभिभावकों का अनुमानित खर्च : करीब 50 करोड़
स्कूलों की अनुमानित काली कमाई : 5 से 10 करोड़
दुकानदारों की अनुमानित कमाई : 10 से 12 करोड़
(आंकड़ा अनुमानित, इसका उद्देश्य अभिभावकों को जागरूक करना है)


जयप्रकाश कुमावत, संयोजक सर्व शिक्षा सर्व चिकित्सा जागृति मंच से बातचीत

प्रश्न – आप शिक्षा व आरटीई के लिए काम करते हैंैं, इस मामले में आपका क्या कहना है?

उत्तर – यह तो खुला खेल है, नियम भी बने हैं, जिला शिक्षा अधिकारी कार्रवाई नहीं करते। अभिभावक डरते हैं कि उनके बच्चों को स्कूल प्रताडि़त न कर दे।

प्रश्न – अभिभावकों को क्या करना चाहिए?

उत्तर – अभिभावकों को खुलकर सामने आना चाहिए। वे बोलेंगे तो स्कूल संचालक दबाव में आएंगे।

प्रश्न – आप खुद जनहित में मुद्दे उठाते हैं, आपका संगठन क्या सहयोग करेगा?

उत्तर – कोई निजी स्कूल से परेशान है तो हम उसके साथ खड़े होंगे। अभिभावक हम से नियमों की जानकारी ले सकते हैं। सदैव अपनी सेवाएं देने के लिए तत्पर हैं।


लूट के खिलाफ विरोध जताएंगे

अभिभावकों को लूटने के लिए निजी स्कूलों और दुकानदारों में आपसी मिलीभगत है। शिक्षा विभाग के अधिकारी भी इसमें शामिल है। सभी में कमीशन बंटता है। इसलिए कार्रवाई नहीं करते। अभिभावक इसलिए चुप है कि स्कूल उनके बच्चों के साथ भेदभाव नहीं करे। इस लूट के खिलाफ हम विरोध प्रदर्शन करेंगे और सम्बन्धित अधिकारियों ने कार्यवाही नहीं की तो कलक्ट्रेट के बाहर धरना दिया जाएगा।

शम्भूसिंह मेड़तिया, जिलाध्यक्ष, अखिल राजस्थान संयुक्त कर्मचारी महासंघ

साभार : राजस्‍थान पत्रिका
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