निजी विश्वविद्यालयों में शोध नहीं करा सकेंगे सरकारी शिक्षक

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निजी विश्वविद्यालयों में शोध नहीं करा सकेंगे सरकारी शिक्षक

राजकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षक निजी विश्वविद्यालयों में शोधकार्य नहीं करा सकेंगे। इतना ही नहीं कोई भी शिक्षक अपने रिश्तेदारों का सुपरवाइजर भी नहीं बन सकेगा और ना ही थीसिस जांचने के लिए उसे परीक्षक बनाया जाएगा। शोध कार्य पर विवि का एकाधिकार होगा और सभी शोधार्थियों को थीसिस का कॉपीराइट विवि को देना होगा।

राजस्थान में शोध कार्यों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए गठित की गई कुलपतियों की शोध गुणवत्ता समिति ने ये सिफारिशें राज्यपाल कल्याण सिंह को सौंपी हैं। समिति ने सिफारिश की है कि राजकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कार्यरत पूर्णकालिक शिक्षकों कोही शोध पर्यवेक्षक बनाया जाए

सेवानिवृत्ति के दो साल पहले और लंबीछुट्टी पर जाने वाले शिक्षकों को नए छात्र आवंटित न किए जाएं। नॉन क्रीमिलेयर के छात्रों को जातिगत आरक्षण न देने के साथ ही प्रोफेसर को आठ, असिस्टेंट प्रोफेसर को छह और एसोसिएट प्रोफेसर को चार से ज्यादा शोधार्थी आवंटित नहीं किए जाएंगे। नहीं चलेगा कॉपी-पेस्ट सभी विश्वविद्यालयों को थीसिस एग्जामिनर पैनल गठित करना होगा। जिसमें 50 फीसदी परीक्षक दूसरे राज्यों या आईआईटी-आईआईएम जैसे प्रीमियर इंस्टीट्यूट के होंगे।

डिग्री अवार्ड करने से पहले विवि को जांच करनी होगी कि छात्र ने शोध सामग्री कहीं से चुराई तो नहीं है। अवार्ड के बाद विवि को पूरी थीसिस अपनी वेबसाइट और यूजीसी इनफ्लिबनैट पोर्टल पर अपलोड कर सार्वजनिक करनी होगी। समिति ने सिफारिश की है कि थीसिस में इस्तेमाल किए गए डिजाइन औरडवलपमेंट का कॉपीराइट विवि के नाम होगा और इनका इस्तेमाल दूसरी डिग्री,डिप्लोमा या व्यवसाय के लिए नहीं किया जा सकेगा।

ऐसे बनी शोध नीति

राज्यपाल कल्याण सिंह ने 29 जनवरी कोकुलपतियों की समन्वय समिति की बैठक में राज्य विश्वविद्यालयों में शोध कार्यों (एमफिल और पीएचडी) की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सख्त नियम लागू करने के आदेश दिए थे। जिसके लिए राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, कोटा विश्वविद्यालय और कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपतियों के नेतृत्व में शोध गुणवत्ता समिति गठित कर उन्हें नई शोध नीति तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों से मिले सुझावों के आधार पर समिति ने नई शोध नीति का ड्राफ्ट तैयार कर मंजूरीके लिए एक सितंबर को राज्यपाल कल्याणसिंह को सौंप दिया।

सेमेस्टर प्रणाली से होगी पढ़ाई

नई शोध नीति के मुताबिक प्रवेश परीक्षा में 50 फीसदी से ज्यादा अंक लाने वाले छात्रों को ही प्रवेश का मौका दिया जाएगा। कोर्स वर्क परीक्षा में भी 55 फीसदी अंक लाने वाले छात्र को ही पास माना जाएगा। कोर्स वर्क परीक्षा में दो बार फेल होने वाले छात्रों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। पास होने वाले शोधार्थियों की पढ़ाई सेमेस्टर प्रणाली से की जाएगी।

शोधार्थी हर छह महीने रिसर्च एडवाइजरी कमेटी को अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट सौंपेगा और प्रजेंटेशन देगा। जिसके बाद कमेटी तय करेगी कि छात्र को अगले सेमेस्टर में प्रवेश दिया जाए या नहीं। हालांकि इस फैसले पर अंतिम मोहर रिसर्च बोर्ड ही लगाएगा।

ये की सिफारिशें

  • 4 साल समय सीमा पार्ट टाइम पीएचडी के लिए कम से कम
  • 7 साल अधिकतम समय सीमा का प्रस्ताव ज्यादा से ज्यादा
  • 3 साल फुल टाइम पीएचडी के लिए समय सीमा कम से कम
  • 6 साल अधिकतम समय सीमा का प्रावधान
  • 2 बार एक साल में परीक्षा होगी पीएचडी के लिए
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