गुरूकुल की तर्ज पर शिक्षा

gurukul गुरूकुल
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गुरूकुल की तर्ज पर शिक्षा

आज के दौर में अगर कोई कहे कि मैं अपने बच्‍चे को गुरुकुल में पढ़ा रहा हूं, तो शायद यह मजाक लगे, बहुत से आधुनिक स्‍कूलों ने भी अपने नाम को “वैदिक टच” देने के लिए गुरुकुल या ऐसे ही नाम दे दिए हैं, लेकिन हम आपको बताएं कि देश में अभी एक ऐसा गुरुकुल भी है, जहां आज भी वेदों की शिक्षा गुरुकुल पद्धति से दी जाती है, ये वैसा ही गुरुकुल है, जैसा हम प्राचीन पुस्‍तकों में पढ़ते आए हैं।

हरियाणा के आदिबद्री के जंगलों में बने गुरूकुल की खास बात ये है कि यहां फीस के तौर पर इन बच्चों से कुछ भी नहीं लिया जाता है। यमुनानगर से लगभग 55 किलोमीटर दूर आदिबद्री के जंगलों की जहां आज भी बच्चों को उस जमाने की तरह ही शिक्षा-दीक्षा दी जाती है। वहीं यहां पढ़ने वाले बच्चों का कहना है कि उन्हें शहर के वातावरण से दूर यहां पढ़ाई करना अच्छा लगता है।

बच्चों को हवा पानी के बीच बैठ कर तपस्या करनी होती है और बच्चे भी मन लगाकर पढ़ते है। अनुशासन और संयम के बीच बच्चों को अनोखी कलाएं सिखाई जाती है। किसी को भी वहां जाने और कैमरा ले जाने की इजाजत नहीं मिलती। गुरूकुल के महंत ने अनुरोध करने पर इस विशेष शिक्षा का जहां अभ्यास करवाया जाता है। यहां बच्चे नंगे पांव जंगली रास्ते पर चलते हुए तपस्या के लिए जाते हैं।

इस गुरूकुल में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उतरांचल, उत्तर प्रदेश और बिहार के छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। इनकी उम्र सात साल से लेकर 15 साल तक की है

हर उम्र के बच्चे को एक साथ ही पढ़ाया जा रहा है और वह भी जंगलों से आ रहे पानी के कुंड के बीच में बच्चे पानी में अपने गुरू के साथ बैठ कर पढ़ाई करते है। एक ही आवाज में जब यह छात्र मंत्रों को उच्चारण करते हैं तो वातावरण भी उनकी वाणी में ही तब्दील हो जाता हैं। वन्य प्राणी भी इनके श्लोक सुनने के लिए वहा बैठे नजर आ रहे थे।

दूर दराज से आए बच्चों को केवल यहां ब्रह्म ज्ञान ही नहीं बल्कि समाजिक शिक्षा का भी ज्ञान दिया जाता है। बच्चे सुबह चार बजे उठने के बाद हर तरह का व्यायाम करते हैं और उसके बाद सामाजिक शिक्षा दोपहर को आराम करने के बाद इन बच्चों को हिन्दू रिति रिवाज के सभी प्रकार का ज्ञान दिया जाता है।

संस्कृत के श्लोक इन बच्चों ने ऐसे रट गए है कि वह इनको बोलते समय माहौल को ही मंत्रबद्ध कर देते हैं। ये सभी छात्र धोती कुर्ता और गले में जनेउ डाल कर भगवान की तपस्या करते हैं। इस गुरूकुल में पढ़ने के लिए बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाता है।

यही नहीं इन बच्चों के लिए खाने-पीने और रहने का भी प्रबंध भी गुरुकुल ही करता है, जबकि इस गुरूकुल को एक रूपए की भी अनुदान कहीं से नहीं मिलता। अपने ही खर्चे पर यहां के महंत और गुरूकुल के बह्मचारी इसे चला रहे हैं।

गुरुकुल के शास्त्री जी बताते हैं कि वेदों की पद्धति के अनुसार यहां त्रिकाल संध्या सिखाई जाती है। त्रिकाल संध्या सुबह, दिन और शाम को की जाती है। बच्चों को चारों वेदों की भी शिक्षा दी जाती है।

जंगलों को इसलिए चुना है ताकि बाहर का कोई नकारात्‍मक ऊर्जा यहां न आ सके। यहां का वातावरण शांत है इसलिए इसे गुरुकुल के लिए चुना गया है।

साभार Pradesh 18

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